Jeene Ki Rah
अहंकारी व्यक्ति जब कोई प्रश्न पूछता है तो उत्तर में वही सुनना चाहता है, जो उसकी इच्छा होती है। उसे उत्तर के पीछे के सत्य से कोई लेना-देना नहीं होता। रावण ने हनुमानजी से प्रश्न तो पूछे थे, पर हनुमानजी भी जानते थे कि इस विश्व विजेता को उत्तर देने का तरीका कुछ अनूठा रखना होगा। चूंकि लंका के लोग देह पर ही अधिक टिकते हैं। जब मनुष्य केवल देह को ही प्रधानता दे तो उसे राक्षस वृत्ति कहेंगे।
हनुमानजी ने उत्तर देने का सिलसिला देह से ही शुरूकिया। खायउं फल प्रभु लागी भूंखा। कपि सुभाव तें तोरेउं रूखा।। सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी।। हे राक्षसों के स्वामी! मुझे भूख लगी थी, इसलिए मैंने फल खाए और वानर स्वभाव के कारण वृक्ष तोड़े। हे मालिक! देह सबको परम प्रिय है। कुमार्ग पर चलने वाले दुष्ट राक्षस जब मुझे मारने लगे, तब मैंने उन्हीं को मारा, जिन्होंने मुझ पर प्रहार किया और यह भी स्पष्ट कर दिया कि मैं इसलिए बंधा हूं क्योंकि मैं भगवान का काम कर रहा हूं। जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बांधेउं तनयं तुम्हारे।। मोहि न कछु बांधे कइ लाजा। कीन्ह चहउं निज प्रभु कर काजा।।
तब जिन्होंने मुझे मारा, उनको मैंने भी मारा। उस पर तुम्हारे पुत्र ने मुझको बांध लिया। मुझे अपने बांधे जाने की कुछ भी लज्जा नहीं है। मैं तो बस अपने प्रभु का काम करना चाहता हूं। रामकाज का अर्थ होता है - ईमानदारी और परिश्रम से सद्कार्य करना। हनुमानजी रावण और हम लोगों को यह समझा रहे हैं कि सत्य और धर्म के पक्ष में यदि शस्त्र भी उठाना पड़े तो उठाया जाना चाहिए। इस हिंसा मंे बहुत बड़ी अहिंसा छिपी हुई होगी।
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